विद्युत

विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है। विद्युत से अनेक जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है?

विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है। विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति ही विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि।

कुछ वस्तुएँ रगड़ने के पश्चात हलकी वस्तुओं को आकर्षित करती हैं। इसका उल्लेख थीआफ्रैस्टस (Theophrastus) ने ३२१ ई.पू. में तथा प्लिनि (Pliny) ने सन् ७० में किया था। इस आकर्षण शक्ति का अध्ययन १६ वीं शताब्दी में विलियम गिलबर्ट (१५४०-१६०३ ई.) द्वारा हुआ तथा उन्होंने इसे ‘इलेक्ट्रिक’ कहा।

वस्तुओं की रगड़ के कारण विद्युत दो प्रकार की होती है, घनात्मक एवं ऋणात्मक। पहले इनके क्रमश: काचाभ (vitreous) तथा रेजिनी (resionous) नाम प्रचलित थे। सन् १७३७ में डूफे (Du Fay, १६९९-१७३९) ने बताया कि सजातीय आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं तथा विजातीय आकर्षित करते हैं

अठ्ठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में आवेशों के चलन (अर्थात् विद्युत प्रवाह) के संबंध में कई प्रयोग तथा सिद्धांत प्रकाश में आने लगे थे। सन् १७८० में इटली के ल्युगी गैलवानी (Luigi Galvani, सन् १७३७-१७९८) ने मेढक के ऊपर विद्युत प्रवाह के कई प्रयोग किए। सन् १८०० में वोल्टा (Volta, सन् १७४५-१८२७) ने तनु अम्ल अथवा लवण विलयन से भीगी हुई दो असमान धातुओं में विद्युत प्रभाव पाए तथा उनसे विद्युत धारा प्राप्त की। इस विद्युत प्रवाह को कई गुना करने के लिए उन्होंने ऐसी कई असमान धातुओं के जोड़ों को लेकर एक पुंज बनाया जिसे वोल्टीय पुंज (Volta’s pile) कहते हैं। वोल्टा द्वारा इन प्रयोगों के अनुसार विद्युद्धारा प्राप्त करने के लिए ‘वोल्टीय सेल’ की रचना हुई।

विद्युत आवेश (Electric charge): विद्युत आवेश दो प्रकार के होते हैं |

  1. धन आवेश (Positive charge): कांच कि छड को जब रेशम के धागे से रगडा जाता है तो इससे प्राप्त आवेश को धन आवेश कहते हैं |
  2. ऋण आवेश (Negative charge):एबोनाईट कि छड को ऊन के धागे से रगडा जाता है तो इस प्रकार प्राप्त आवेश को ऋण आवेश कहा जाता है |
  • इलेक्ट्रानों कि कमी के कारण धन आवेश उत्पन्न होता है |
  • इलेक्ट्रानों कि अधिकता से ऋण आवेश उत्पन्न होता है |

चालक (Conductor) :

वे पदार्थ जो अपने से होकर विद्युत आवेश को आसानी से प्रवाहित होने देते हैं चालक कहलाते हैं | उदाहरण : तांबा, सिल्वर, एल्युमीनियम इत्यादि |

  • अच्छे चालक धारा के प्रवाह का कम प्रतिरोध करते हैं |
  • कुचालकों का धारा के प्रवाह की प्रतिरोधकता बहुत अधिक होती है |

कुचालक (Insulator) : वे पदार्थ जो अपने से होकर विद्युत धारा को प्रवाहित नहीं होने देते हैं वे पदार्थ विद्युत के कुचालक कहलाते हैं | उदाहरण : रबड़, प्लास्टिक, एबोनाईट और काँच इत्यादि |

चालकता (Conductivity) : चालकता किसी चालक का वह गुण है जिससे यह अपने अंदर विद्युत आवेश को प्रवाहित होने देते हैं |

अतिचालकता (Superconductivity) : अतिचालकता किसी चालक में होने वाली वह परिघटना है जिसमें वह बहुत कम ताप पर बिल्कुल शून्य विद्युत प्रतिरोध करता है |

विद्युत परिपथ (Electric Circuit) :

किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं |

विद्युत का प्रवाह (The flow of the electricity):

आवेशों की रचना इलेक्ट्रोन करते हैं | विद्युत धारा को धनआवेशों का प्रवाह माना गया तथा धनावेश के प्रवाह की   दिशा  ही  विद्युत धारा की दिशा  माना  गया |  परिपाटी के अनुसार किसी
विद्युत  परिपथ  में  इलेक्ट्रॉनों  जो ऋण आवेश  हैं,  के  प्रवाह  की  दिशा  के  विपरीत  दिशा को
विद्युत धारा की दिशा माना जाता है।

यदि किसी चालक की किसी भी अनुप्रस्थ काट से समय t में नेट आवेश Q प्रवाहित होता है तब उस अनुप्रस्थ काट से प्रवाहित विद्युत धारा इस प्रकार व्यक्त करते हैंः

I = Q/t

विद्युत आवेश का SI मात्रक (unit) कूलम्ब (C) है, जो लगभग 6×1018 इलेक्ट्रोनों में समाए आवेश के तुल्य होता है |